इस ब्लॉग पर मै आपके साथ ग़ज़ल, गीत, मुक्तक, दोहा, कविता, इत्यादि रचनाएँ साझा करता रहूँगा। Copyright@ मुकेश पाण्डेय "जिगर"
Tuesday, December 12, 2023
मुक्तक: वर्तमान के वर्गखंड से
मुक्तक
अंधियारे को हरने वाला सूरज फिर से निकलेगा।
ज्योत जलेगी ज्ञान की तो अज्ञान मोम सा पिघलेगा।
कोई शिक्षक, कोई लेखक, कोई वैज्ञानिक होगा।
वर्तमान के वर्गखण्ड से भावी भारत निकलेगा।
स्लोगन: पर्यावरण
1.
मत करो इसका हरण
अनमोल है पर्यावरण
2.
पर्यावरण संरक्षित होगा
जीवन तभी सुरक्षित होगा
3.
पर्यावरण बचाना है
जीवन स्वर्ग बनाना है
4.
करते हैं सबका भरण
धरा ,सूर्य ,पर्यावरण
5.
पानी खनिज तत्वों से मां आंचल है भरती पर्यावरण को संतुलित करती है धरती
6.
काट काट कर वृक्ष हम करें न खुद का नाश शुद्ध रखें पर्यावरण शुद्ध मिलेगी श्वास
7.
दुनिया के हर जीव का करें सदा सम्मान
रखे शुद्ध पर्यावरण अपनी मिल्कत मान
8.
निर्भर है एक वृक्ष पर कई जीव की जान
प्राण वायु दे मुफ्त में तू है बड़ा महान
मुकेशकुमार पाण्डेय "जिगर"
Mo. 7874707567
गीत: पर्यावरण है बचाना
गीत: पर्यावरण है बचाना
नदियों में हमने कचरा डाला
नहरें बना दीं गंदा नाला
पानी भी है प्रदूषित, हवा भी है प्रदूषित
पर्यावरण को बिगाड़ा.....
बर्बाद कर डाला - 4
झीलें प्रदूषित, दरिया प्रदूषित
गंगा और यमुना नदियां प्रदूषित
हरे भरे ये खेत भी हमारे
केमिकल वाली खाद से प्रदूषित।
पानी भी है प्रदूषित, हवा भी है प्रदूषित
पर्यावरण को बिगाड़ा
बर्बाद कर डालाजेड- 4
सोलर लगाओ ऊर्जा बचाओ
पौधे लगाओ वर्षा लाओ
पानी बचाओ बिजली बचाओ
ई मोटर गाड़ी घर में लाओ
पानी है शुद्ध रखना, हवा है शुद्ध रखनी
पर्यावरण है बचाना
वादा है निभाना -4
मुकेशकुमार पाण्डेय "जिगर"
Mo.7874707567
Saturday, October 28, 2023
એ સમજ્યા નહિ
મારા હાલાત, એ સમજ્યા નહિ
હૃદયના આઘાત, એ સમજ્યા નહિ
જોયા જીગરના, સફળતાના દિવસો
સંઘર્ષોની રાત, એ સમજ્યા નહિ
ગઝલ કેમ લખવી, પડે છે જીગરને
આંખોની વાત, એ સમજ્યા નહિ
વ્હાલો હતો, બેવફાઈનો બગડો
સાથનો સાત, એ સમજ્યા નહિ
લડતા રહ્યા બસ, ધરમ જાતિઓ પર
માણસની જાત, એ સમજ્યા નહિ
- મુકેશકુમાર પાંડેય "જીગર"
Monday, August 28, 2023
ગીત: રાખડી
રાખડી
ભાવનાના આભમાં અનંત છે આ રાખડી,
લાગણીના મંદિરોની સંત છે આ રાખડી...
બેનની દુવાઓ એના ભાઈને ફળી સદા,
ભાઈને નડે જે એવી આફતો ટળી સદા.
મેઘ પ્રેમનો બનીને આવી રાખડી સદા,
ભાઈ બેનના હૃદયથી વરસી લાગણી સદા.
રાગ દ્વેષના તમસનો અંત છે આ રાખડી,
લાગણીના મંદિરોની સંત છે આ રાખડી...
ભાઈ બેનનું મિલન આ રાખડી કરાવતી,
દોરીઓ આ હાથ, ભાલ, આંગળી મળાવતી.
નાળિયેરી પૂનમે એ પ્રેમ લઈને આવતી,
છોડ થોરનો હટાવી રાતરાણી વાવતી.
વેર ભાવ દૂર કરતી ખંત છે આ રાખડી,
લાગણીના મંદિરોની સંત છે આ રાખડી.
લાગણીની દોરીઓ કદી ના તૂટે હે પ્રભુ,
બેન કોઈ ભાઈ થી કદી ના રૂઠે હે પ્રભુ.
પ્રેમનો ખજાનો આ કદી ના ખૂટે હે પ્રભુ,
સાથ ભાઈ બેનનો કદી ના છૂટે હે પ્રભુ.
ભાઈ બેનના હૃદયનો પંથ છે આ રાખડી,
લાગણીના મંદિરોની સંત છે આ રાખડી.
-- મુકેશકુમાર પાંડેય 'જિગર'
Monday, December 19, 2022
बाल काव्य (चूहा आया -चूहा आया)
चूहा आया- चूहा आया,
बिना बुलाए खुद ही आया।
घर में जाने कहाँ से आया,
कुतर- कुतर कर सब कुछ खाया।
एक पूँछ दो आँखें पाईं,
चार पैर से दौड़ लगाई।
छुप-छुपकर बिल में है रहता,
बिल्ली मौसी से है डरता।
रात हुए जब सब सो जाते,
चूहा जी तब दौड़ लगाते।
गणेशजी की हैं ये सवारी,
मुँह पर मूछें लगती प्यारी।
कागज,कपड़े,फसल,मिठाई,
खाकर के लेते अंगड़ाई।
जो मिल जाए सब कुछ खाते,
मिश्राहारी ये कहलाते।
रोज निराले खेल दिखाते,
चुन्नू मुन्नू को हर्षाते।
@ मुकेशकुमार पाण्डेय
Mo. 7874707567
Email: mukeshpandeyjigar@gmail.com
Tuesday, November 22, 2022
Muktak: wahi to chakradhari hai
वही तो चक्रधारी हैं, वही बंसी बजैया हैं
हैं पालनहार दुनिया के, वही सब के खिवैया हैं
जो दुर्योधन का वैभव त्याग कर खाएं विदुर के घर
वही माधव हैं मोहन हैं वही सबके कन्हैया है
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