वो आजकल ना जाने क्यों, परवाह करते हैं बहुत,
हमको नए खतरों से भी, आगाह करते हैं बहुत।
जिसके गमों की आंच ने, शायर बनाया है हमें,
वो भी हमारे शेर पर, अब वाह करते हैं बहुत।
हर दर, गली, कूचे में ही, भटका बहुत तेरे लिए,
तेरे शहर के लोग भी, गुमराह करते हैं बहुत।
सुनकर तेरा पैगाम ही, टूटा हूँ मैं तो बारहा,
इस दौर के इंसान भी, अफवाह करते हैं बहुत।
सुनता हूँ चारों ओर अब, चर्चा उसी का कूबकू,
तारीफ उसके हुस्न की, मद्दाह करते हैं बहुत।
जिनकी निगाहे शोख का, कायल जहां है आज भी,
उनसे मिलन की ही “जिगर”, हम चाह करते हैं बहुत।
@ मुकेश पाण्डेय "जिगर"- अहमदाबाद
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