इस ब्लॉग पर मै आपके साथ ग़ज़ल, गीत, मुक्तक, दोहा, कविता, इत्यादि रचनाएँ साझा करता रहूँगा। Copyright@ मुकेश पाण्डेय "जिगर"
Monday, July 25, 2022
बचपन
Sunday, July 10, 2022
सरस्वती वंदना (गीत) - कवि मुकेश पाण्डेय "जिगर"
Thursday, May 20, 2021
गीत (कोरोना महामारी और पर्यावरण को समर्पित)
कैद है आज पिंजरे में हर आदमी,
और उड़ना परिंदो का आसान है।
जान लेता है चुन–चुन के इंसान की,
जानवर पर शिकारी मेहरबान है।
इस धरा पर सभी श्रोत भरपूर थे,
नाश हमने स्वयं ही बहुत कुछ किया।
प्यार से पालती हम को कुदरत रही,
और हमने उसी को प्रदूषित किया।
कष्ट देते रहे जिन सजीवों को हम,
आज वो हैं सुखी जग परेशान है।
कैद है आज ..............................
दी दवा, फूल, फल जिस शजर ने हमें,
बेरहम बन उसे काटते हम रहे।
तुच्छ समझा किए सारे जीवों को हम,
खुद को सर्वोपरी मानते हम रहे।
मर्ज ऐसा दिया इस अगोचर ने की,
आदमी जिस की औषध से अंजान है।
कैद है आज ..............................
हमने मीलें बना डालीं वन काट कर,
होड़ ऐसी लगी अंधे उत्कर्ष की।
बंद हैं आज उध्योग धंधे सभी,
आ गई है घड़ी ऐसे संघर्ष की।
याद फिर आ गया गाँव हर शख्स को,
हर शहर इक बिमारी से हैरान है।
कैद है आज ..........................
--- मुकेश पाण्डेय “जिगर”
Friday, September 18, 2020
ग़ज़ल: चंदन लगाकर मूर्ख भी पंडित बने है देखिए ।
ग़ज़ल
अपने
ही मुँह मिट्ठू मिया बनने लगे हैं देखिए
चन्दन लगाकर
मूर्ख भी, पंडित बने हैं देखिए।
नीचा
दिखाना गैर को, जिनकी रही फितरत सदा,
अपनी ही
नजरों में वो खुद, अब गिर चुके हैं देखिए।
रचते
रहे जो उम्र भर, षड्यंत्र गैरों के लिए,
सबको फँसाने वाले वो, अब खुद फँसे हैं देखिए।
कैसे
करोगे तुम “जिगर”, उम्मीद गैरों से कोई,
भाई भी अब तो भाई से, जलने लगे हैं देखिए।
कैसे
ये मानूँ मैं “जिगर”, मुझसे मुतासिर वो नही,
उसने हमारे शेर ही, खत में लिखे हैं देखिए।
--- मुकेश पाण्डेय “जिगर”
Friday, September 11, 2020
गीत: हिंदी दिवस पर
गीत
हम सदा सबकी भाषा का आदर करें,
पर हमें अपनी हिन्दी का अभिमान हो ।
अब हरेक दिन हमारा हो हिन्दी दिवस,
हिन्द की अब तो हिन्दी ही पहचान हो।
खो गए पश्चिमी सभ्यता में यूँ हम,
हिन्दी भाषा का अपमान करते रहे।
अपनी माता का आदर न कर पाए हम,
और मौसी का सम्मान करते रहे।
सीखते हम रहें सबकी भाषा भले,
अपनी भाषा से लेकिन न अंजान हों।
हम सदा सबकी भाषा का आदर करें,
पर हमें अपनी हिन्दी का अभिमान हो।
एक धागे में सबको पिरोती है जो,
एकता की लड़ी है बनाती सदा।
दूरियाँ दो दिलों की घटाती है जो,
सबका संपर्क सबसे कराती सदा।
देशव्यापी से ये विश्वव्यापी बने,
सारी दुनिया में हिन्दी का गुणगान हो।
हम सदा सबकी भाषा का आदर करें,
पर हमें अपनी हिन्दी का अभिमान हो।
होने देंगे न हिन्दी का अपमान हम,
आज खुद को ही खुद ये वचन दीजिए।
हिन्दी भाषा का गौरव बढ़ाएँगे हम,
आज हिन्दी दिवस पर ये प्रण कीजिए।
हिन्दी भाषा सदा यूँ ही फूले – फले,
और सफल हम सभी का ये अभियान हो।
हम सदा सबकी भाषा का आदर करें,
पर हमें अपनी हिन्दी का अभिमान हो।
अब हरेक दिन हमारा हो हिन्दी दिवस,
हिन्द की अब तो हिन्दी ही पहचान हो।
---- मुकेश पाण्डेय “जिगर”
Friday, August 28, 2020
ग़ज़ल
दिल के जज़्बात दिल में दबाते रहे,
प्यार आंखों से लेकिन जताते रहे,
बात दिल की कभी हमसे कह ना सके,
बस हमें देख नज़रें झुकाते रहे,
हारते हम रहे बाजियाँ इश्क में,
फिर भी दिल हम उन्ही से लगाते रहे,
हाले-दिल जो बयाँ उनसे कर ना सके,
अपनी ग़ज़लों में सबको सुनाते रहे,
दिल ने दिल से किए थे जो वादे कभी,
वो भुलाते रहे हम निभाते रहे।
उनकी यादों की स्याही से दिल पर लिखी,
शायरी आँसुओ से मिटाते रहे ।
इश्क में दिल तो उनका भी धड़का "जिगर",
हम बताते रहे वो छुपाते रहे,
@ मुकेश पाण्डेय "जिगर"

